जापान में माफ़िया का राज : याकुज़ा का इतिहास और प्रभाव

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दुनिया के कई सारे देशों में अपराध और माफ़िया संगठनों ने लंबे समय तक अपनी पकड़ बनाए रखी है। इटली में “कोसा नोस्ट्रा” और अमेरिका में “ला कोसा नोस्ट्रा” की तरह, जापान में भी एक शक्तिशाली माफ़िया संगठन मौजूद रहा है, जिसे याकुज़ा माफ़िया (Yakuza Mafia) कहा जाता है। जापान का यह अपराधी गिरोह केवल अपराध और हिंसा तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीति, व्यापार और समाज पर भी इसका गहरा असर पड़ा।


याकुज़ा का उदय

याकुज़ा माफ़िया की उत्पत्ति 17वीं शताब्दी यानी “एदो काल” से मानी जाती है। उस समय जापान में दो प्रकार के लोग समाज से बाहर कर दिए गए थे:

  • टेकिया (Tekiya) – जो अवैध तरीके से दुकाने या ठेले लगाकर धंधा करते थे।
  • बाकुटो (Bakuto) – जो जुआ खिलाने और जुए से कमाई करने में शामिल रहते थे।

इन्हीं दोनों वर्गों के लोगों ने मिलकर धीरे-धीरे एक संगठित गिरोह का रूप ले लिया। याकुज़ा का मतलब ही है – “बेकार हाथ” या “निष्फल”, जो ताश के खेल से लिया गया है। यह नाम शुरू में अपमानजनक था, लेकिन बाद में इन्होंने इसे अपनी पहचान बना लिया।


संगठन और अनुशासन

याकुज़ा साधारण गुंडों की तरह नहीं थे, बल्कि उनका पूरा ढांचा एक सैन्य संगठन की तरह था।

  • गिरोह का सरगना ओयाबुन (Oyabun) कहलाता था।
  • उसके नीचे काम करने वाले सदस्य कोबुन (Kobun) कहलाते थे।
  • इसमें गुरु-शिष्य जैसा रिश्ता होता था। शिष्य गुरु के लिए पूरी निष्ठा से काम करता और बदले में गुरु उसकी रक्षा करता।

याकुज़ा माफ़िया के सदस्यों पर कड़ी अनुशासनात्मक पाबंदियां होती थीं। वे अपने गिरोह की वफादारी साबित करने के लिए कभी-कभी अपनी ऊँगली का हिस्सा काटकर सरगना को सौंपते थे। इसे युबित्सुमे (Yubitsume) कहा जाता है।


अपराध जगत पर पकड़

याकुज़ा माफ़िया की मुख्य गतिविधियां रही हैं:

  • जुआ, वेश्यावृत्ति और मादक पदार्थों की तस्करी
  • उधार देकर ब्याज वसूलना
  • निर्माण कंपनियों और व्यापारियों से सुरक्षा शुल्क लेना
  • काले धन को सफेद बनाने का धंधा

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान में जब गरीबी और बेरोजगारी बढ़ी, तब याकुज़ा ने आम लोगों को अपने जाल में फँसाया। वे बेरोजगारों को काम, सुरक्षा और पैसे का लालच देकर संगठन से जोड़ते थे।


राजनीति और समाज में दखल

याकुज़ा केवल अपराध की दुनिया तक सीमित नहीं रहे। कई बार वे राजनीतिक दलों और नेताओं को चुनाव जीताने में मदद करते थे। बदले में उन्हें सरकारी ठेकों और आर्थिक लाभों का हिस्सा मिलता था। जापान के बड़े शहरों, खासकर टोक्यो और ओसाका में याकुज़ा माफ़िया का खासा प्रभाव रहा। वे अक्सर प्राकृतिक आपदाओं या त्योहारों में दान और सेवा कार्य भी करते थे। इस कारण आम जनता का एक हिस्सा उन्हें “जरूरत के समय मददगार” मानता रहा। हालांकि उनका असली मकसद अपनी छवि सुधारना और लोगों का विश्वास जीतना था।


पहचान और प्रतीक

याकुज़ा माफ़िया गैंग्स के शरीर पर बने बड़े-बड़े टैटू (Irezumi) उनकी पहचान माने जाते हैं। ये टैटू पूरे शरीर पर होते थे और जापानी संस्कृति के पौराणिक पात्रों, ड्रैगन, शेर या देवी-देवताओं को दर्शाते थे। यह टैटू केवल सजावट नहीं बल्कि साहस, निष्ठा और संगठन के प्रति समर्पण का प्रतीक माने जाते थे।


सरकार की कार्रवाई

20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जापानी सरकार ने याकुज़ा माफ़िया पर कड़े कदम उठाने शुरू किए।

  • 1992 में “एंटी-याकुज़ा लॉ” लागू हुआ।
  • पुलिस ने उनके आर्थिक स्रोतों पर शिकंजा कसना शुरू किया।
  • बैंकों और कंपनियों को चेतावनी दी गई कि वे याकुज़ा से किसी भी तरह का वित्तीय (financial) संबंध न रखें।

इसके बाद से उनकी ताकत कमजोर पड़ने लगी। हालांकि वे अब भी मौजूद हैं, लेकिन उनकी गतिविधियां पहले जैसी खुली और ताकतवर नहीं रहीं।


आज का याकुज़ा माफ़िया 

आज जापान में याकुज़ा के सदस्य लाखों की संख्या में नहीं हैं, बल्कि उनकी संख्या काफी घट चुकी है। नए जमाने में सरकार और पुलिस की सख्ती, साथ ही बदलते सामाजिक मूल्यों ने उन्हें कमजोर कर दिया है। फिर भी जापान में उनकी छाया पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कई बार रियल एस्टेट, निर्माण कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय अपराध जगत में उनकी गतिविधि सामने आती रहती है।

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निष्कर्ष

याकुज़ा माफ़िया संगठन एक समय पर पूरे जापान देश पर भय का साया बनकर छाया हुआ था। उनकी जड़ें इतिहास में गहराई तक फैली थीं और उनका प्रभाव राजनीति से लेकर समाज तक था। हालांकि आज उनकी ताकत घट चुकी है, लेकिन उनका अतीत इस बात का गवाह है कि संगठित अपराध किसी भी राष्ट्र की संरचना को किस हद तक प्रभावित कर सकता है।

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